Monday, November 9, 2015

ख्वाब

ऐक अरसे बाद यकायक ;
आज़ ख़ुद से मुलाक़ात हुई। 
कुछ देर लगी पहचानने में;
गोया कि नयी पहचान लगी।।

पहले अकसर मिला करते थे;
ज़िंदगी की तंग गलियों में। 
और घंटो बातें होती थी;
सस्ती चाय की चुस्कियों पें।।

गिरती बारिश की बूंदों मैं ;
मोती चुना करते थे। 
और झाड़ों की नाज़ुक सुनहरी धूप के;
गहने भुना करते थे।।

रात को कोठे पे, मंझी में  लेटे लेटे;
साथ साथ, चाँद तका करते थे। 
और सर्द तारों की छाओं में;
ख़्वाब पिरोया करते थे।।

पर ज़िन्दगी की तंग गलियां तोड़ के ;
अब खुली सड़कें मैंने बनायीं हैं।  
और रफ़्तार भरी इस ज़िन्दगी में ; 
एक भीड़ उमड़ आई हैं।।

इस भीड़ में कहीं , वोह मगर ;
कुछ गुमशुदा सा हो गया। 
और ख्वाब तो पूरे हुए अपने ;
पर शायद वह कहीं गिरवी रह गया।।

2 comments:

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